गुलाब का फूल

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English: Rashtrapati Bhawan illuminated on 26-29 Jan, every year on occasion of Indian Republic Day Anniversary. हिन्दी: राष्ट्रपति भवन, को प्रतिवर्ष २१६-२९ जनवरी तक गणतंत्र दिवस की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में प्रकाशित किया जाता है। (Photo credit: Wikipedia)

छोटी सी मिनी बिटिया स्कूल से दौड़ती घर पहुँची तो सीधे नानी के पास गई और बोली, “नानी, देखो मैं दौड़ में पहला नंबर आयी हूँ। मुझे ये कप मिला है।”

नानी ने अपना चश्मा लगाया और कप अपने हाथ में लेकर देखा और बोली, “शाबाश बिटिया, ये तो बहुत प्यारा कप है।

अच्छा बताओ, इस बात पर तुम्हें मेरे पास से क्या मिलेगा?”

“एक रुपया,” मिनी ने खुशी से उचकते हुए कहा।

“कैसे जाना कि मैं तुम्हें एक रुपया दूँगी,” नानी ने प्रश्न किया।

“वाह, नानी भूल गये। इसके पहले जब भी मैं परीक्षा में पहला नंबर आयी आपने मुझे एक रुपया ही तो दिया था,” मिनी बोली।

“तो उन रुपयों का तुमने क्या किया?” नानी पूछा।

“वो सारे मैंने गुल्लक में डाल दिये,” मिनी ने जवाब दिया।

“देखो, अब जो मैं तुमको रुपया दूँ तो उसे गुल्लक में मत डालना। उसे जो तुम्हारे मन में भाये उसमें खर्च करना। ठीक है।” यह कह नानी ने मिनी को एक रुपया दिया और कहा, “जा, इससे कुछ खरीद ले।”

बाज़ार मिनी के घर के पास था। मिनी रुपया लेकर बाज़ार तरफ दौड़ पड़ी। वहाँ उसने सड़क पर खूब भीड़ देखी। सड़क पर वर्दी पहने सैनिक धुन बजाते मार्च कर रहे थे और सड़क के दोनों ओर लोग कतारबद्ध खड़े थे। मिनी ने देखा कि भीड़ में प्रायः सभी लोगों के हाथ में पुष्पगुच्छ थे। उसने सोचा कि शायद सड़क पर से किसी परी की सवारी जा रही होगी और उसको फूल भेंट करने लोग जमा हैं। फिर उसने सोचा कि हो सकता है कि कोई राजकुमार जिसकी कहानी नानी बताती थी वही जा रहा हो। इस तरह के अनेक विचार उसके मन में उठे। वह वहाँ से दौड़ पड़ी और फूलवाले के पास के पास जाकर उसने नानी का दिया रुपया दिखाकर कहा, “क्या वह उसे एक रुपये में फूल का गुच्छा दे सकेगा?”

फूलवाले ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, इस एक रुपये में तो मैं एक गुलाब का फूल ही दे सकूँगा।”
मिनी ने कहा, “ठीक है,” और वह एक गुलाब का फूल लेकर भीड़ की तरफ दौड़ी। परन्तु भीड़ में उसे अंदर जाने नहीं मिल रहा था। तभी एक जवान सैनिक की नज़र उस पर पड़ी। वह दूसरी तरफ से भीड़ चीरता मिनी के पास आया और मिनी को गोद में उठाकर अपने साथ ले वहाँ ले चला जहाँ सैनिकों मार्च करते बढ़ रहे थे और उनके पीछे एक फूलों से ढकी तोपगाड़ी जा रही थी। वह सैनिक उसे तोपगाड़ी के पास ले गया। अचानक बैंड की धुन बंद हो गई और मार्च करते सैनिक रुक गये। जवान ने गोदी से उतारकर मिनी को तोपगाड़ी के पायदान पर खड़ा कर दिया। मिनी ने तुरंत उस तोपगाड़ी के फूलों के ढ़ेर पर अपना गुलाब का फूल रख दिया। सब सैनिकों ने मिनी को सलाम किया और उनकी देखा-सीखी में मिनी ने भी तोपगाड़ी के पायदान पर ही खड़े रहकर अपना नन्हा-सा हाथ उठाकर सलाम किया। तभी बैंड की धुन पुनः बज उठी।

जवान ने आगे बढ़कर मिनी को फिर से गोदी पर उठा लिया और सड़क किनारे उतार दिया। मिनी ने देखा कि जवान की आँखें गीली हो उठीं थी। मिनी ने अपनी नन्ही-सी हथेली से उस जवान के आँसू पोंछे। पास खड़ी भीड़ के लोगों में से किसी ने मिनी की पीठ थपथपाई तो किसी ने उसे गोदी में उठाकर उसके गालों पर चुम्मी दी। मिनी खुशी से दौड़ती अपने घर तरफ जाने लगी। तभी फूल की दुकानवाले ने उसे बुलाया और कहा, “बिटिया रानी! तूने तो मेरे दिये फूल की बहुत शान बढ़ाई है। यह अपना दिया रुपया वापस ले।”

मिनी ने घर आकर नानी को सारी किस्सा बताई, तो नानी ने कहा, “मिनी बिटिया, जानती है तूने क्या किया? तूने वह गुलाब का फूल एक शहीद को भेंट किया है। मेरे दिये एक रुपये का तूने सम्मान किया है। मैं इस बात पर तुम्हें एक रुपया और देती हूँ।”

तब मिनी ने अपने नन्ही-सी हथेली खोलकर नानी को बताया, “नानी, वो फूलवाले ने भी मुझे बुलाकर मेरा रुपया वापस दिया और कहा कि मैंने उसके दिये फूल की शान बढ़ाई है, इसलिये वह रुपया वापस दे रहा है। मैंने वह रुपया ले लिया। ठीक किया ना, नानी।”

“मेरी प्यारी बच्ची,” नानी ने मिनी को गोदी में उठाकर कहा, “तू पैसे का अच्छा उपयोग करना जानती है, इसलिये ही फूलवाले ने तुझे वह रुपया वापस किया है।”

Eli Pariser: Beware online “filter bubbles” | Video on TED.com

Eli Pariser: Beware online “filter bubbles” |  Video on TED.com

આ અહીં મુકેલ એક વિડિઓ નથી પણ આ એક વાત છે, એક વિચાર છે, એક ભવિષ્ય ની ચિંતા છે, શું ખરેખર internet  ની સાચી જવાબદારી બદલાઈ ગઈ છે ? શું internetઅને એને લાગતીઓ બધીજ બાબતો મા શું એવો તો બદલાવ આવી ગયો છે કે આપને ને એજ બતાવશે કે જે આપણે જાણવા ઈચ્છીએ છીએ કે એ બતાવશે કે જે આપણી જાણ સારું છે. શું internet કે જે એક આશીર્વાદ હતો એ દિવસે ને દિવસે આપણ ને ગુલામી મા તો નથી લઇ જઈ રહીયો ને. આ એક એવો વિષય છે કે સમય અને વિચાર માગી લે એવો છે.

Facebook was looking at which links I clicked on, and it was noticing that I was clicking more on my liberal friends’ links than on my conservative friends’ links. And without consulting me about it, it had edited them out. They disappeared.” (Eli Pariser)